अनुभवी शिक्षकों को अब नई परीक्षा की तैयारी करनी पड़ रही है जबकि वे वर्षों से सफलतापूर्वक पढ़ा रहे हैं। बिना टीईटी के पदोन्नति और भविष्य की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। जिन शिक्षकों ने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा विभाग में अपनी योग्यता से शिक्षा व्यवस्था को संवारने में लगा दिया है, अचानक उनकी पात्रता का आंकलन एक वस्तुनिष्ठ परीक्षा के आधार पर करना और सेवा समाप्त करने की शर्त थोपना न केवल अन्यायपूर्ण है बल्कि मानवाधिकारों का भी हनन है। पूर्व ब्लाक उपाध्यक्ष बालकृष्ण चंद ने कहा कि वर्षों की निष्ठापूर्ण सेवा को एक परीक्षा के नतीजे से जोड़कर एल टी शिक्षकों की आजीविका और सम्मान को संकट में डालना संवैधानिक मूल्यों के भी विरुद्ध है। एलटी संवर्ग पर टीईटी की बाध्यता मुख्य रूप से 2014 के नियमावली संशोधन और उसके बाद की व्याख्या का परिणाम है। यह न तो मूल सेवा नियमों के अनुरूप है और न ही शैक्षणिक दृष्टि से न्यायसंगत। यदि कक्षा 6-8 की जिम्मेदारी एलटी पर थोपी गई थी तो उसके लिए अलग व्यवस्था या योग्यता तय की जानी चाहिए थी न कि पूरे कैडर को टीईटी-II के दायरे में लाकर अन्याय किया जाना।
कर्मचारी शिक्षक संगठन के जिला उपाध्यक्ष सुभाष गोला ने कहा कि राज्य सरकार को चाहिए कि वह 2014 से पूर्व नियुक्त एलटी शिक्षकों को इस बाध्यता से मुक्त रखे या कम से कम माध्यमिक स्तर की वास्तविकता और विशेष विषयों की अलग प्रकृति को ध्यान में रखते हुए व्यावहारिक समाधान निकाले।वक्ताओं का मत था कि सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य रूप से आरटीई अधिनियम के अंतर्गत कक्षा 1 से 8 के शिक्षकों के लिए टीईटी को अनिवार्य माना है। माध्यमिक स्तर कक्षा 9-10 के शिक्षकों पर यह आदेश स्वतः लागू नहीं होता। उत्तराखंड में 2014 के बाद एलटी कैडर को कक्षा 6-8 की जिम्मेदारी दी गई इसलिए विभाग अब पूरे एलटी संवर्ग पर टीईटी थोप रहा है। यह व्याख्या अत्यधिक विस्तृत और एकतरफा लगती है।

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