डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारत के सबसे प्रमुख और लोकप्रिय राष्ट्रीय शिक्षा बोर्डों में से एक केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) इन दिनों अपने कुछ निर्णयों और कार्यशैली के चलते विवादों में घिर गया है। 12वीं बोर्ड की परीक्षा में कॉपियों के मूल्यांकन की पारम्परिक तकनीक बदलने के चलते बड़ी संख्या में स्टूडेंट्स बोर्ड पर अंकों के नाम पर अन्याय करने का आरोप लगा रहे हैं। स्टूडेंट्स अपने छह सवालों का बोर्ड से स्पष्ट उत्तर मांग रहे हैं।
सवाल नंबर-1 : क्या नई ओएसएम व्यवस्था है जिम्मेदार?
बोर्ड ने इस वर्ष एक बड़ा प्रयोग करते हुए ओएसएम (On-Screen Marking) डिजिटल स्क्रीन पर कॉपियां चेक करने की नई प्रक्रिया अपनाई। आरोप है कि इससे कॉपी जांच रहे शिक्षकों पर दबाव बढ़ गया। समय से काम पूरा करने में चेकिंग में भी तेजी अपनाई गई लेकिन अपर्याप्त प्रशिक्षण के कारण गलतियां हुईं। कई शिक्षकों ने खुद स्वीकार किया है कि रोजाना ज्यादा कॉपियां चेक करनी पड़ीं। इस ओएसएम साइट के हैक होने के भी आरोप लग रहे हैं।
सवाल नंबर-3 : क्या बड़ी संख्या में कॉपियां हो गईं स्वैप?
कई छात्रों को उनकी अपनी कॉपी नहीं, बल्कि किसी और छात्र की आंसर शीट मिली। जैसे फिजिक्स की कॉपी का बहुचर्चित मामला जिसमें वेदांत नाम के एक छात्र ने दावा किया कि बोर्ड ने उन्हें अंक जांचने के बाद फिजिक्स की जो कॉपी उन्हें दी है, वह किसी और की है।
विवाद बढ़ता गया। सीबीएसई ने वेदांत की सही आंसर शीट ढूंढी और उसे घर जाकर दी। इस बीच वेदांत को सोशल मीडिया पर ट्रोल होना पड़ा। उन्हें कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर उसे देशद्रोही तक कह दिया था। भले ही इस मामले में बोर्ड ने अपनी गलती मान ली है लेकिन स्टूडेंट्स में इसके बाद से अविश्वास बढ़ गया।
सवाल नंबर-4 : क्या धुंधली कॉपियां बनीं चुनौती?
वेदांत का मामला सामने आने के बाद बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं ने स्कैन कॉपी मांगनी शुरू कर दीं। आलम यह है कि 12वीं की बोर्ड परीक्षा में शामिल हुए हर चौथे छात्र ने अपनी कॉपी को लेकर शिकायत दर्ज कराई है। बोर्ड के मुताबिक, परीक्षा में कुल 17,68,962 छात्रों में से 4,04,319 यानी 22.85 प्रतिशत स्टूडेंट्स ने उत्तरपुस्तिकाओं की स्कैन कॉपी मांगी है, जो किसी भी बोर्ड में पहली बार हुआ।
कॉपियां मिलने के बाद अब यह शिकायत आ रही है कि जांची गई कॉपियां पढ़ने लायक नहीं थीं। इससे सही वेरिफिकेशन में मुश्किल हो रही है। नतीजा वही, स्टूडेंट्स में अविश्वास। स्टूडेंट्स का अब भी यही आरोप है कि फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथ्स, बायोलॉजी जैसे विषयों में छात्रों के प्री-बोर्ड/कोचिंग के प्रदर्शन से बहुत कम नंबर आए हैं।
सवाल नंबर-5 : क्या शिक्षकों को समय पर न बुलाना पड़ा भारी?
बता दें कि बोर्ड की ओर से स्पष्ट निर्देश थे कि धुंधली कॉपी को रिजेक्ट कर दें। इसके बावजूद कई शिक्षकों ने ब्लर कॉपियां जांच दीं। इन पर छात्रों को या तो कोई नंबर नहीं दिए गए या बहुत कम नंबर मिले। इसका मुख्य कारण बताते हुए कहा जा रहा है कि पहले शिक्षकों को परीक्षा खत्म होते ही 10 दिन के भीतर ही बुला लिया जाता था लेकिन इस बार उन्हें एक महीने की देरी से बुलाया गया था। इस देरी से शिक्षकों पर काम करने में ज्यादा दबाव पड़ा। लापरवाही का यही परिणाम अब सब पर भारी पड़ गया।
सवाल नंबर-6 : पुरानी व्यवस्था बनाम नई व्यवस्था में बेहतर कौन?
पुरानी व्यवस्था में दो मूल्यांकनकर्ता आपस में कॉपियों की अदला-बदली करके उसे त्रुटिरहित बनाते थे। इससे कई तरह की गलतियां नहीं होती थीं। वह जांच में सामने आ जाती थीं। इससे हर सवाल के अंक जांचने के साथ ही उसकी टोटलिंग की खामियों को भी सुधार लिया जाता था।
इसके बाद असिस्टेंट हेड एग्जामिनर रैंडमली कॉपियां उठाकर देखते थे। फिर हेड एग्जामिनर भी ऐसे ही कॉपियों की जांच करते थे। मगर इस बार इतनी बारीक पड़ताल नहीं की गई। कुछ ही कॉपियों की क्रॉस-चेकिंग की गई। उसके बाद हड़बड़ी में परिणाम जारी कर दिए गए।
जांची गई कॉपियों ने ही उजागर किए सभी सवाल
जांची गई कॉपियों की बात करें तो कई तरह के विवाद सामने आए हैं। इनमें सबसे प्रमुख हैं अनचेक उत्तर, टोटलिंग में गलती, मिसिंग मार्क्स और मूल्यांकन करने वाले की ओर से जानबूझकर या लापरवाही से कम नंबर देना।
- कई छात्रों ने स्कैन कॉपी देखने के बाद पाया कि उनके कुछ प्रश्नों के उत्तर पूरी तरह अनचेक छोड़ दिए गए थे। खासकर अतिरिक्त (सप्लीमेंट्री) शीट्स या उत्तर पुस्तिका के पिछले पन्नों के उत्तर स्कैनिंग के दौरान छूट गए हैं। यह भी सामने आया है कि मूल्यांकन करने वाले को स्क्रीन पर कॉपी स्पष्ट दिखाई ही नहीं दी।
- दूसरी बड़ी समस्या टोटलिंग गलती की रही। कई मामलों में पाया गया है कि मूल्यांकन करने वाले ने अलग-अलग प्रश्नों में सही अंक दिए, लेकिन अंतिम कुल अंकों (टोटल) में गड़बड़ी हो गई। सॉफ्टवेयर में टोटल गलत दर्ज होने, कुछ अंकों को शामिल न करने या तारांकित (Asterisk) वाले अंकों को छोड़ देने जैसी त्रुटियां आम रहीं।
- मिसिंग मार्क्स की शिकायत भी बहुत आई, जिसमें कॉपी जांचने वाले ने उत्तर पढ़ा और चेक किया, लेकिन अंक दर्ज ही नहीं किए। नतीजतन, छात्र को उस प्रश्न के लिए शून्य अंक दिख रहे थे, जबकि उत्तर सही या आंशिक सही था। इसके अलावा, मूल्यांकनकर्ता की ओर से कम नंबर देने की शिकायतें भी काफी आईं।
- जांच में यह भी सामने आया है कि ओएसएम सिस्टम के तहत शिक्षकों पर भारी दबाव था। उन्हें प्रतिदिन बहुत अधिक कॉपियां चेक करनी पड़ रही थीं, जिससे जल्दबाजी में चेकिंग से लापरवाही व थकावट बढ़ गई। ये सभी गलतियां मिलकर छात्रों के परिणाम पर गंभीर असर डाल रही हैं।
पोर्टल और तकनीकी गड़बड़ियां
पोर्टल बार-बार क्रैश होना, पेमेंट फेल होना, गलत फीस कटना, और अतिरिक्त शुल्क कटौती। सीबीएसई ने खुद तकनीकी खामी माना और रिफंड का एलान किया। विवाद यही समाप्त नहीं होता। स्टूडेंट्स की ओर से सुरक्षा संबंधी आरोप भी लगाए गए हैं। कुछ छात्रों ने पोर्टल की कमजोरियों का दावा किया। हालांकि, सीबीएसई बोर्ड ने इसे खारिज किया है।
सीबीएसई 12वीं के स्टूडेंट्स अब क्या करें?
यह तो स्पष्ट है कि यह पहली बार ओएसएम लागू होने के कारण हुई समस्याओं का समेकित परिणाम है। बोर्ड ने कुछ गलतियों को स्वीकार किया है और सुधार की बात कही है, लेकिन छात्रों में भारी असंतोष और विश्वास की कमी है।
फिलहाल, बोर्ड की वेबसाइट पर तकनीकी गड़बड़ी के चलते अब भी कुछ आवेदन अटके हुए हैं। बोर्ड का कहना है कि इनमें आंसर शीट से जुड़ी गड़बड़ 27 तक पूरा कर लिए जाएंगे। 29 मई से पुनर्मूल्यांकन प्रक्रिया भी शुरू हो जाएगी।
अधिकारियों ने कहा कि जिस समय अंतिम आंसरशीट जारी होगी, उसके दो दिन बाद तक पुनर्मूल्यांकन के आवेदन को विंडो खुले रहेगी। बोर्ड ने कहा कि जिन छात्रों को अपनी आंसरशीट के लेकर शिकायत है, वे अंकों के सत्यापन या पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन कर सकते हैं।

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