नई दिल्ली: भारतीय संसदीय इतिहास में 16 से 18 अप्रैल 2026 का समय स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज होने जा रहा है. लोकसभा में सांसदों के बीच सर्कुलेट किए गए तीन नए विधेयकों ने साफ कर दिया है कि देश एक बड़े राजनीतिक और संवैधानिक बदलाव की दहलीज पर खड़ा है. ये विधेयक न केवल संसद के स्वरूप को बदलेंगे, बल्कि देश के हर नागरिक के प्रतिनिधित्व की परिभाषा को भी नए सिरे से परिभाषित करेंगे. सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा लोकसभा की सीटों की संख्या का है, जो अब बढ़कर 850 होने वाली है.
क्या है 850 सीटों का नया गणित?
वर्तमान में लोकसभा की 543 सीटों पर चुनाव होते हैं, जो 1971 की जनगणना के आधार पर तय की गई थीं. लंबे समय से यह मांग उठ रही थी कि बढ़ती जनसंख्या के हिसाब से सांसदों की संख्या बढ़ाई जाए. सरकार द्वारा लाए जा रहे ‘संवैधानिक संशोधन बिल (131वां संशोधन)’ के जरिए अनुच्छेद 81 में बड़ा बदलाव किया जा रहा है.
नए प्रावधानों के मुताबिक, राज्यों से चुने जाने वाले सदस्यों की संख्या 815 तक हो सकती है. इसके अलावा, केंद्र शासित प्रदेशों (UTs) का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्यों की संख्या बढ़ाकर 35 कर दी गई है. यह विस्तार इसलिए जरूरी हो गया था क्योंकि कई लोकसभा क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या 25 से 30 लाख तक पहुंच गई है, जिससे एक सांसद के लिए अपने क्षेत्र का विकास करना और जनता से जुड़ना मुश्किल हो रहा था.
महिला आरक्षण: अब जनगणना का इंतजार खत्म
इस पूरे विधायी बदलाव का सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण हिस्सा ‘महिला आरक्षण’ है. 106वें संशोधन अधिनियम, 2023 के जरिए महिलाओं को 33% आरक्षण देने का वादा किया गया था, लेकिन शर्त यह थी कि यह अगली जनगणना और परिसीमन के बाद लागू होगा. विपक्ष और कई संगठन इसे ‘देरी की रणनीति’ बता रहे थे.
लेकिन अब, इन नए बिलों के जरिए सरकार ने मास्टरस्ट्रोक खेला है. महिला आरक्षण कानून को 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के चक्र से अलग कर दिया गया है. अब इसे सीधे तौर पर परिसीमन आयोग की कार्यवाही से जोड़ दिया गया है.
यानी, जैसे ही परिसीमन आयोग अपनी रिपोर्ट सौंपेगा और नई सीटों का निर्धारण होगा, वैसे ही 33% आरक्षण लागू हो जाएगा. यह आरक्षण लोकसभा, सभी राज्य विधानसभाओं, दिल्ली, पुडुचेरी और जम्मू-कश्मीर की विधानसभाओं में प्रभावी होगा.
परिसीमन आयोग 2026: कितनी शक्तिशाली होगी यह संस्था?
‘परिसीमन विधेयक, 2026’ वह तीसरा स्तंभ है जिस पर नए भारत की चुनावी संरचना टिकी है. इस बिल के माध्यम से एक शक्तिशाली परिसीमन आयोग के गठन का मार्ग प्रशस्त किया गया है. इस आयोग की संरचना बेहद उच्च स्तरीय रखी गई है:
- अध्यक्ष: सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड या मौजूदा जज.
- सदस्य: मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) या उनके द्वारा नामित निर्वाचन आयुक्त.
- राज्य प्रतिनिधि: संबंधित राज्य का राज्य निर्वाचन आयुक्त.
आयोग के पास एक सिविल कोर्ट की शक्तियां होंगी. यह गवाहों को बुला सकता है, सरकारी रिकॉर्ड की मांग कर सकता है और ‘जियोग्राफिक इंफॉर्मेशन सिस्टम’ (GIS) विशेषज्ञों की मदद ले सकता है. यह आयोग ही तय करेगा कि 850 सीटों का बंटवारा राज्यों के बीच किस आधार पर होगा.
राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों पर असर: दिल्ली से कश्मीर तक का हाल
इन विधेयकों के जरिए केंद्र शासित प्रदेशों के कानूनों में भी व्यापक संशोधन किए जा रहे हैं. ‘केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2026’ के माध्यम से तीन प्रमुख कानूनों (1963, 1991 और 2019 के अधिनियम) को बदला जा रहा है.
पुडुचेरी: यहां विधानसभा की सदस्य संख्या अब परिसीमन आयोग तय करेगा, लेकिन यह कम से कम 30 होगी. इसके अलावा, मनोनीत सदस्यों की संख्या 3 से बढ़ाकर 5 कर दी गई है, जिसमें कम से कम 2 महिलाओं का होना अनिवार्य है.
दिल्ली (NCT): दिल्ली विधानसभा के लिए न्यूनतम 70 सीटों का प्रावधान बरकरार रखा गया है, लेकिन परिसीमन के बाद यह संख्या काफी बढ़ सकती है. यहां भी महिला आरक्षण और जनसंख्या की नई परिभाषा लागू होगी.
जम्मू और कश्मीर: यहां विधानसभा की न्यूनतम सीटें 114 तय की गई हैं. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) के लिए 24 सीटें खाली रखी जाएंगी. यह स्पष्ट संदेश है कि भारत अपने संपूर्ण भूभाग पर अपना दावा कभी नहीं छोड़ेगा.
सहयोगी सदस्यों की भूमिका: क्या सांसदों की चलेगी?
परिसीमन की प्रक्रिया में पारदर्शिता और स्थानीय इनपुट सुनिश्चित करने के लिए ‘सहयोगी सदस्यों’ (Associate Members) का प्रावधान किया गया है. हर राज्य के लिए आयोग में 10 सहयोगी सदस्य होंगे – 5 लोकसभा सांसद और 5 विधायक. इनका नामांकन लोकसभा अध्यक्ष और संबंधित विधानसभा के अध्यक्ष करेंगे.
हालांकि, इनके पास शक्ति सीमित है. ये आयोग की चर्चाओं में भाग ले सकते हैं और अपनी राय दे सकते हैं, लेकिन उन्हें अंतिम निर्णयों पर वोट देने या हस्ताक्षर करने का अधिकार नहीं होगा. यह व्यवस्था इसलिए की गई है ताकि राजनीतिक दल परिसीमन की प्रक्रिया में बाधा न डाल सकें और आयोग निष्पक्ष तरीके से काम कर सके.
जनसंख्या का असंतुलन और पलायन: क्यों बदला आधार?
सरकार का कहना है कि पिछले 50 सालों में देश के जनसांख्यिकीय ढांचे में भारी बदलाव आया है. दक्षिण भारतीय राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में अच्छा काम किया है, जबकि उत्तर भारतीय राज्यों में जनसंख्या तेजी से बढ़ी है. इसके अलावा, गांवों से शहरों की ओर बड़े पैमाने पर पलायन हुआ है.
पुराने आंकड़ों (1971) पर टिके रहने से शहरी मतदाताओं के प्रतिनिधित्व में कमी आई थी. नए बिलों का उद्देश्य इस असमानता को दूर करना है. अब ‘जनसंख्या’ को नए सिरे से परिभाषित किया गया है, जो शहरीकरण और पलायन के वास्तविक आंकड़ों को दर्शाएगी. इससे उन इलाकों को ज्यादा प्रतिनिधित्व मिलेगा जहां की आबादी में पिछले दशकों में भारी उछाल आया है.

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