Saturday, 29 November 2025

"उत्तराखंड सरकारी स्कूलों को चाहिए स्वायत्तता" ??? क्या इससे शिक्षा में गुणवत्ता सुधार होगा ??🤔🤔


उत्तराखंड की सरकारी शिक्षा प्रणाली आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है, जहाँ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्कूलों के अस्तित्व को बचाना एक बड़ी चुनौती बन गया है। प्रदेश के पहाड़ी और मैदानी दोनों क्षेत्रों में सरकारी स्कूल लंबे समय से अनेक समस्याओं का सामना कर रहे हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में फैली भौगोलिक विषमता, विद्यालयों तक कठिन पहुँच, छात्रों की अनियमितता, संसाधनों की कमी और जनसंख्या का बिखराव शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित करता है। दूसरी ओर मैदानी क्षेत्रों में सरकारी स्कूल निजी स्कूलों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करते हैं, जिससे अभिभावकों का रुझान धीरे-धीरे सरकारी शिक्षा से हटकर निजी शिक्षा की ओर बढ़ गया है। पिछले बीस वर्षों में सरकारी स्कूलों का नामांकन तेजी से गिरा है, जबकि शिक्षण कार्य के लिए योग्य और अनुभवी शिक्षक पहले की ही तरह उपलब्ध हैं। यदि समस्या शिक्षकों की कमी नहीं है, तो प्रश्न यह उठता है कि आखिर सरकारी स्कूल अपनी गुणवत्ता को क्यों नहीं बनाए रख पा रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है—अत्यधिक प्रशासनिक दखल, दफ्तरी कामों का बोझ और स्कूलों को निर्णय लेने की स्वतंत्रता का अभाव।

वर्तमान स्थिति में सरकारी स्कूलों को BEO, DEO, CEO, AD, Director और DG स्तर तक फैले आदेशों और निर्देशों का पालन करना पड़ता है, जिससे विद्यालय केवल एक प्रशासनिक इकाई बनकर रह जाते हैं। हेडमास्टर और प्रिंसिपल के पास अपने विद्यालय के लिए कोई स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार नहीं होता। हर कार्यक्रम, हर परीक्षा, हर गतिविधि उच्च-स्तरीय कार्यालयों के निर्देशों पर निर्भर रहती है। इस पूरे तंत्र का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव शिक्षकों पर पड़ता है, जिन्हें पढ़ाने से ज्यादा समय कागज़ी कार्यवाही, डाटा एंट्री, निरीक्षण फॉर्म, और योजनाओं से जुड़े दफ्तरी कामों में व्यतीत करना पड़ता है। परिणामस्वरूप शिक्षण-सीखने की मूल प्रक्रिया प्रभावित हो जाती है और छात्रों को वह शैक्षणिक माहौल नहीं मिल पाता जिसकी उन्हें आवश्यकता है। सरकारी स्कूलों में “कागज़ फिट” रखने की मानसिकता इस कदर हावी है कि नवाचार, प्रयोगात्मक गतिविधियाँ और छात्र-केंद्रित शिक्षा पीछे छूट गई हैं।

इसके बिल्कुल विपरीत, उत्तराखंड के निजी विद्यालयों में प्रिंसिपल को पूर्ण शैक्षणिक और प्रशासनिक स्वायत्तता प्राप्त होती है। वे अपनी सुविधा और रणनीति के अनुसार मासिक टेस्ट, प्री-बोर्ड परीक्षा, रिमेडियल कक्षाएँ तथा अन्य गतिविधियाँ आयोजित कर सकते हैं। अभिभावकों के साथ नियमित संवाद, छात्रों की लगातार प्रगति की निगरानी और परिणाम सुधार पर केंद्रित योजनाएँ निजी स्कूलों को अधिक सक्षम बनाती हैं। यही कारण है कि निजी विद्यालय बोर्ड परीक्षा से पहले समय पर प्री-बोर्ड आयोजित कर लेते हैं और उसके बाद परीक्षा की बेहतर तैयारियाँ करा पाते हैं, जबकि अधिकांश सरकारी स्कूलों में प्री-बोर्ड तब होते हैं जब प्रैक्टिकल परीक्षाएँ शुरू होने वाली होती हैं। ऐसे में छात्रों को प्री-बोर्ड का वास्तविक लाभ नहीं मिल पाता और न ही शिक्षक कमज़ोर छात्रों पर पर्याप्त ध्यान दे पाते हैं। यह अंतर सीधे-सीधे परिणामों में दिखाई देता है।

उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों के लिए सबसे अधिक आवश्यकता इस बात की है कि उन्हें स्कूल स्तर पर वास्तविक स्वायत्तता दी जाए। जब तक स्कूलों को अपने शैक्षणिक और प्रशासनिक कार्य स्वयं तय करने की स्वतंत्रता नहीं दी जाएगी, तब तक सरकारी शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार की उम्मीद करना कठिन है। यदि स्कूलों को मासिक परीक्षाएँ, गृह परीक्षाएँ, प्रगति परीक्षण, प्री-बोर्ड आयोजित करने और छात्र गतिविधियों की योजना बनाने का अधिकार मिल जाए, तो न केवल शिक्षकों की भूमिका प्रभावी होगी, बल्कि छात्र भी अधिक गंभीरता से पढ़ाई करेंगे। इसके साथ ही शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों से मुक्त कर केवल शिक्षण पर केंद्रित करने की आवश्यकता है। ऑनलाइन पोर्टल और योजनाओं से जुड़े कार्यों के लिए अलग स्टाफ नियुक्त किया जाना चाहिए ताकि शिक्षकों का समय और ऊर्जा वास्तविक शिक्षण में लग सके। इसके अलावा निरीक्षणों की संख्या कम कर उनकी प्रक्रिया को सरल और व्यवहारिक बनाया जाना चाहिए ताकि स्कूल भयमुक्त वातावरण में काम कर सकें।

उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों के लिए विशेष शिक्षा नीति की आवश्यकता है, क्योंकि वहाँ की स्थितियाँ मैदानी क्षेत्रों से बिल्कुल भिन्न हैं। मल्टीग्रेड टीचिंग, छात्रों की कम संख्या, परिवहन की समस्या, और मौसम संबंधी बाधाएँ शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं। यदि पहाड़ी स्कूलों को विशेष स्वायत्तता, स्थानीय स्तर पर स्टाफ प्रबंधन के अधिकार और बच्चों की सुविधा को ध्यान में रखकर लचीले नियम दिए जाएँ, तो शिक्षा की स्थिति में बड़ा सुधार हो सकता है। इसके साथ ही विद्यालयों को खेल-कूद, कला, विज्ञान, तकनीक और जीवन कौशल से जुड़ी गतिविधियों को बढ़ावा देने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए ताकि छात्रों का सर्वांगीण विकास हो सके।

यदि उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों को वास्तविक स्वायत्तता मिलती है तो विद्यालयों में नवाचार और रचनात्मकता को बढ़ावा मिलेगा। शिक्षक प्रेरित होकर पढ़ाएंगे, प्रिंसिपल नेतृत्व की वास्तविक भूमिका निभा सकेंगे और छात्र अधिक आत्मविश्वास के साथ सीख सकेंगे। इससे न केवल परिणाम बेहतर होंगे, बल्कि सरकारी स्कूलों में अभिभावकों का भरोसा भी लौटेगा। स्वायत्तता मिलने पर सरकारी स्कूल पूरी तरह से “आदेश आधारित प्रणाली” से “परिणाम आधारित शिक्षा प्रणाली” की ओर बढ़ सकेंगे। सरकारी स्कूलों का पुनरुत्थान तभी संभव है जब राज्य सरकार प्रबंधन से अधिक अधिकार स्कूलों और शिक्षकों को सौंपे और दफ्तरी बाधाओं को कम करे। शिक्षा का मूल उद्देश्य बच्चों का भविष्य बनाना है, और यह तभी संभव है जब विद्यालयों को स्वतंत्रता, संसाधन और विश्वास मिले। उत्तराखंड की नई पीढ़ी के लिए एक सक्षम, आधुनिक और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व्यवस्था तैयार करना अब समय की माँग है, और इसका पहला कदम है—स्कूलों को वास्तविक स्वायत्तता देना

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